निम्नलिखित में संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –
(अ) समुद्र में स्तरीकरण, (ब) आपेक्षिक जनसंख्या घनत्व विधियाँ एवं
(स) नाइट्रोजन स्थिरीकरण ।
उत्तर –
(अ) समुद्र में स्तरीकरण (Stratification in ocean) –
समुद्री जल में चार स्तर पाये जाते हैं –
(i) बेलांचक जोन (Littoral zone) । —यह उथले पानी का अन्तराज्वारीय स्तर होता है। यह क्षेत्र पुनः अध ज्वारीय (Sub-ratidal) अन्तरज्वारीय (Intertidal) क्षेत्रों में विभाजित रहता है।
(ii) उप-बेलांचक जोन (Sub-littoral zone) —यह बेलांचक जोन के आगे खुले समुद्र का प्रदेश है। इस स्तर की सीमा सूर्य के प्रकाश की पहुँच तक होती है। यह जोन सतह से 200 मीटर तक गहराई में फैला रहता है। इसे यूफोटिक जोन भी कहते हैं।
(iii) आर्किबेन्थिक जोन (Archibenthic zone) समुद्री पानी में 200-1000 मीटर की गहराई तक यह जोन होता है। सूर्य प्रकाश यहाँ नहीं पहुँच पाता है।
(iv) ऐबाइसल जोन (Abyssal zone) समुद्री पानी में 1000 मीटर गहराई से अन्त तक यह जोन पाया जाता है। सूर्य का प्रकाश पूर्णतः अनुपस्थित रहता है।
समुद्री जल के कुछ जलीय आवासों में वातावरणीय कारकों में वर्टीकल ग्रेडिएण्ट (Vertical gradient) के कारण समुदाय के प्राणियों में स्तरीकरण हो जाता है।
(ब) आपेक्षिक जनसंख्या घनत्व विधियाँ (Relative population density methods) —
इस विधि के द्वारा वास्तविक जनसंख्या घनत्व को ज्ञात नहीं किया जा सकता है बल्कि इसके द्वारा जनसंख्या घनत्व का मोटा अनुमान लगाया जा सकता हैं। इसके तहत् निम्न विधियाँ आती है—
(i) जाल पकड़ संख्या विधि (Net trap method) -इस विधि में एक निश्चित क्षेत्र में प्रत्येक प्रि उपयोग में लाये जाने के लिए जाल के द्वारा पकड़ा जाता है और इन प्राणियों की जनसंख्याका मोट के द्वारा. पकड़े गये प्राणियों को गिनकर लगाया जा सकता है। इस विधि का उपयोग सामान्यतः को शाका तथा जलीय प्राणियों के लिए उपयोग किया जाता है। इसके द्वारा विभिन्न जातियों के प्राणियों की न्यूनतम एवं अधिकतम जनसंख्या का पता चलता है।
(ii) वायुकोष ध्वनि तरंग आवृत्ति (Vocal call frequency) – इस विधि का उपयोग मुख्य रूप से क्षयों के लिए किया जाता है। एक निश्चित समयावधि में किसी पक्षी विशेष की वायुकोष ध्वनि तरंगों या होली की संख्या अंकित करके इन पक्षियों का जनसंख्या घनत्व का अनुमान कर लिया जाता है। इस विधि का उपयोग पक्षियों में एक निश्चित ध्वनि तरंग में गाना गाने वाले पक्षियों पर सफलतापूर्वक किया जाता है।
(iii) प्रति इकाई क्षेत्र पकड़ विधि (Per unit capture method) – इस विधि को सर्वप्रथम डीलरी Dielry, 1947) जिपिन (Zipin, 1959) के द्वारा उपयोग किया गया था। इस विधि का उपयोग उन प्राणियों पर किया जाता है, जो प्राणी एक सीमित क्षेत्र में रहते हैं इस विधि द्वारा एक निश्चित स्थान में बार-बार प्राणियों को एकड़कर उनकी संख्या को ज्ञात कर लिया जाता है। इसके पश्चात् एक निश्चित इकाई पकड़ के अनुपात में पाणियों की संख्या को गिनकर ग्राफ पर अंकित कर लिया जाता है।
(iv) मल की गोलियों की संख्या द्वारा (By faecal pellet number) यह देखा गया है कि कुछ शत्रुओं का मल एक निश्चित आकार की गोलियों के रूप में उत्सर्जित होता है। इन प्राणियों की जनसंख्या घनत्व का अनुमान इन गोलियों की संख्या के आधार पर किया जाता है। इस विधि का उपयोग सामान्यतया खरगोश, चूहे, खरहा, गिलहरी एवं अन्य शाकाहारी प्राणियों के लिए किया जाता है।
(स) नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation) –
यह वह क्रिया है जिसके द्वारा वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को जैवीय स्वीकार्य रूप (Biologically acceptable form) में बदला जाता है यह तीन प्रकार से होता है (i) वायुमण्डलीय स्थिरीकरण (Atmospheric fixation) – यह एक भौतिक रासायनिक प्रक्रिया है।
इसमें ओजोन के रूप में उपस्थित ऑक्सीजन वायुमण्डलीय नाइट्रोजन से क्रिया करती है। इस क्रिया में बिजली
के कड़कने के फलस्वरूप विभिन्न प्रकार के नाइट्रोजन ऑक्साइड्स का निर्माण होता है। N2 + 2 (O) →2NO
2NO + 2 (O) → 2NO 2
2NO 2 + 2(O) → N2O5 यह ऑक्साइड, बारिश के जल में घुलकर जमीन में आते हैं तथा दूसरे लवणों से क्रिया कर नाइट्रेट्स का
निर्माण करते हैं।
N2O5 + H2O → 2HNO3
2HNO3 + CaCO3 Ca (NO3)2 + CO2 +H2O.
विभिन्न प्रकार के दहनों के फलस्वरूप नाइट्रोजन के अनेक गैसीय यौगिक बनते हैं तथा बारिश के पानी के साथ जमीन तक आते हैं।
(ii) इण्डस्ट्रियल स्थिरीकरण (Industrial fixation) इसमें उच्च तापमान और दाब पर नाइट्रोजन और हाइड्रोजन के संयोग से अमोनिया का निर्माण होता है यह अनेक प्रकार के उर्वरकों में बदल जाता है। (iii) बायोलॉजिकल स्थिरीकरण (Biological fixation) – यह विधि नाइट्रोजन स्थिरीकरण का प्रमुख स्रोत है। नाइट्रोजन को स्थिर करने वाले जीव प्रोकैरियोट्स जीवाणु तथा सायनोबैक्टीरिया होते हैं। इसके वहत् मुक्तजीवी (Free living) तथा सहजीवी (Symbiotic) रूप सम्मिलित हैं। मुक्तजीवी जीवाणुओं के अन्तर्गत एजोटोबैक्टर, क्लॉस्ट्रीडियम, रोडोस्पात्रिलम आदि आते हैं। सहजीवी (Symbiotic) जीवाणुओं में राइजोबियम प्रमुख हैं, इसके अलावा फ्रेन्किया जैन्थोमोनॉस भी सहजीवी जीवाणु है, जो वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को स्थिर करते हैं।