सीमाकारी कारक क्या हैं? लीविंग के न्यूनतम नियम एवं सेल्फोर्ड के नियम की विवेचना कीजिए ।
अथवा
महत्वपूर्ण सीमित कारक (Important limiting factors)।
अथवा
परिमितकारी कारकों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर –
(i) सीमाकारी या परिमितकारी कारक (LIMITING FACTORS) —
(i)पेड़-पौधे एवं जन्तु सभी जन्म से लेकर मृत्यु तक अपने एक निर्धारित परिवेश में रहते हैं। इसी परिवेश को वातावरण कहते हैं। वातावरण प्रत्यक्ष रूप से जीवधारियों की जैविक क्रियाओं को प्रभावित करता है। प्रत्येक जीवधारी का वातावरण भौतिक कारकों और रासायनिक पदार्थों से बना होता है। ये संयुक्त रूप से वातावरणीय कारक कहलाते हैं।
जब किसी क्षेत्र में एक वातावरणीय कारक (Environmental factor) अधिकतम सहनशीलता सीमा से अधिक न्यूनतम सीमा से कम हो जाता है, तो वह कारक परिमितकारी हो जाता है। अतः “कोई भी कारक जो किसी भी पारिस्थितिक तन्त्र (Ecosystem) में विभव वृद्धि (Potential growth) का काम करते हैं, उसे परिमितकारी कारक कहते हैं। लीबिग (Liebig) तथा शेल्फोर्ड (Shelford) ने परिमितकारी कारकों के सिद्धान्तों का वर्णन किया तथा ओडम (Odum) ने इन नियमों का विस्तार किया।
(ii) लीबिग का न्यूनतमता का नियम या सिद्धांत —
(LIEBIG’S LAW OF MINIMUM)
जर्मन जीव-रसायनज्ञ जुस्टस वॉन लीबिग (Justus Von Liebig) ने सन् 1840 में सर्वप्रथम एक महत्वपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार जीवधारी आवश्यकताओं की पारिस्थितिकीय शृंखला (Eco logical chains) में सबसे कमजोर कड़ी द्वारा नियन्त्रित हो सकता है। लीबिग ने खनिज पोषकों का पौधों की वृद्धि से सम्बन्ध पता लगाया। उनके अनुसार पौधों की वृद्धि उन पोषक तत्वों या पदार्थों पर निर्भर करती जो आवश्यकतानुसार कम कम मात्रा में उपस्थित होते हैं। इसी को ‘लीबिग का न्यूनतमता का सिद्धान्त कहते हैं। ब्रिटिश वैज्ञानिक ब्लैकमैन (Blackman) ने न्यूनतमता के सिद्धान्त को दूसरे सीमाकारी कारकों के साथ जोड़ा है। दूसरे कारकों एवं अधिकतमता का सीमाकारी प्रभाव सहनशीलता के नियम में सम्मिलित किये। गये। इस प्रकार न्यूनतमता का यह सिद्धान्त सीमाकारी कारकों की अवधारणाओं का एक दृष्टिकोण ही दर्शाता है। इन्हान अध्ययन करके यह बताया कि प्रकाश संश्लेषण की गति चरम तीव्रता से करने वाले कारक की सान्द्रता द्वारा नियन्त्रित होती है।
उदाहरण-पौधों की वृद्धि के सम्बन्ध में जल, कार्बन डाइऑक्साइड आदि कारक कितनी ही अधिक • मात्रा में क्यों न उपलब्ध हों उनका पौधों की वृद्धि के लिए उपयोग बोरॉन जैसे अल्प कारक पर निर्भर करेगा, जो सदैव अल्प मात्रा में भूमि में पाये जाते हैं।
लीबिग ने सीमाकारी कारकों का सिद्धान्त केवल पौधों के लिए दिया था, किन्तु टेलर (Taylor, ने 1934) ने इस सिद्धान्त को सभी जीवधारियों के लिए विस्तृत कर दिया और इसकी परिभाषा निम्नलिखित तरह से दिया
“जीवधारियों की जैविक क्रियाएँ उन सार मूल वातावरणीय कारकों से प्रतिबन्धित रहती हैं, जो न्यूनतम मात्रा में उपलब्ध होते हैं ।”
ओडम (Odum) के अनुसार, लीबिग का न्यूनतमता का सिद्धान्त केवल उन रासायनिक कारकों तक ही सीमित माना जाना चाहिए, जो जीवधारियों की कार्यिकी के लिए आवश्यक है। अतः अन्य वातावरणीय कारकों पर शेल्फोर्ड का सहनशीलता का नियम लागू करना चाहिए।
(iii) शेल्फोर्ड का सहनशीलता (सहिष्णुता) का नियम —
(SHELFORD’S LAW OF TOLERANCE)
व्ही.ई. शेल्फोर्ड (V.E. Shelford) ने सन् 1913 में लीबिग के नियम में कुछ आवश्यक तत्व जोड़े। ‘अनुसार, किसी तत्व की अधिकता भी जीवों के लिए सीमाकारी कारक (Limiting factor) हो सकती है इनके जैसे-ताप (Temperature), प्रकाश (Light), जल (Water) आदि। शेल्फोर्ड के अनुसार “एक आवश्यक पदार्थ का अत्यधिक मात्रा में होना भी उतना ही हानिकारक हो सकता है, जितना उसका अत्यधिक कम होना।” तात्पर्य यह है कि किसी भी पदार्थ की कुछ विशेष सीमाओं से कमी या अधिकता जीवों के लिए। हानिकारक सिद्ध होती है। • इस नियम के अनुसार, प्रत्येक जीव के लिए प्रत्येक कारक की एक उच्चतम व न्यूनतम सीमा होती है। इन दोनों सीमाओं के बीच का परिसर, सहनशीलता का परिसर (Range of tolerence) है ।
शेल्फोर्ड के सहनशीलता नियम के निम्नलिखित पाँच सहायक सिद्धान्त हैं –
1. सहनशीलता की क्षमता (Tolerence capacity) विभिन्न जीवों की सहनशीलता में भिन्नता होती है। किसी जीव की सहनशीलता की सीमा एक कारक के लिए विस्तृत तथा दूसरे कारक के लिए बहुत कम हो सकती है।
2. वितरण प्रणाली (Distribution pattern)—जिन जीवों की सहनशीलता अधिक होती है, वे ज्यादा बड़े क्षेत्र में फैले होते हैं जबकि जिनकी कम होती है, वे छोटे क्षेत्र में फैले रहते हैं।
3. सहनशीलता की सीमा (Range of tolerence ) — जब किसी जाति विशेष के लिए कोई एक वातावरणीय कारक अनुकूल न हो, तो दूसरे कारकों के लिए भी सहनशीलता की क्षमता कम हो जाती है।
4. भौगोलिक स्थितियाँ (Geographical conditions) – प्रकृति में कोई जीव एक कारक विशेष के अनुसार अनुकूलतम परिस्थिति में रहते हैं। ऐसी दशा में दूसरे कारक अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। एक ही जाति के जीवों में एक ही भौतिक कारक के लिए सहनशीलता की सीमाएँ एवं अनुकूलन परिसर बदलते रहते हैं।
5. प्रजनन काल एक चरम अवस्था (Reproductive period as critical phase)— कोई भी वातावरणीय कारक सीमाकारी कारकों की तरह सक्रिय होता है तो जीवधारी का प्रजनन काल उसके जीवन का सर्वाधिक निर्णायक समय होता है। बीजों, अण्डों, भ्रूणों तथा लार्वा आदि के लिए सहनशीलता की सीमाएँ अप्रजननशील जीवों की तुलना में अधिक सीमित होती हैं।
जैसे-पेट्रोमाइजॉन का एमोसीट लार्वा (Ammocoete larva of Petromyzon) समुद्र के खारे पानी को सहन नहीं कर सकता। अतः प्रजनन काल में पेट्रोमाइजॉन समुद्र से नदियों में चला जाता है। जबकि प्रौढ़ पेट्रोमाइजॉन समुद्र के खारे पानी को सहन कर सकता है। इस तरह से समुद्र का खारा जल पेट्रोमाइजॉन के लाव के लिए सीमाकारी कारक का कार्य करता है।
सीमाकारी कारकों की आधुनिक अवधारणा (Modern concept of limiting factors) —
न्यूनतम नियम एवं सहनशीलता का नियम दोनों के प्रभाव का जीवों में साथ-साथ अध्ययन करने से सीमाकारी। कारकों की अधिक सामान्य एवं आधुनिक अवधारणा बनी है। इससे लाभदायक निष्कर्ष प्राप्त होते हैं। इसके अनुसार वातावरण में जीव निम्नलिखित दो परिस्थितियों द्वारा नियंत्रित रहते हैं
1. उन पदार्थों की मात्रा एवं परिवर्तनशीलता जिनकी जीवों को सबसे कम आवश्यकता होती है। 2. वातावरण के व इनके प्रति स्वयं प्राणियों का सहनशीलता-परिसर।
घटकों सीमाकारी कारकों का महत्व — (Importance of limiting factors)
वातावरण के प्रति जीवों के सम्बन्ध बहुत ही महत्वपूर्ण एवं जटिल होते हैं। जीवों के वातावरणीय सम्बन्धों में कई कारकों का सम्मिलित प्रभाव होता है, किन्तु सभी कारक समान महत्व के नहीं होते।
अन्य उदाहरणस्वरूप- सभी प्राणियों के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है, किन्तु कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में ही यह सीमाकारी कारक के रूप में कार्य करते हैं। जैसे—किसी तालाब में मछलियाँ प्रदूषण से मर रही हैं तो मृत्यु का कारण ऑक्सीजन की कमी से हो सकती है, परन्तु यदि किसी स्थलीय इकोतंत्र में स्तनधारी या रेप्टाइल मर रहें हों, तो वहाँ मृत्यु का कारक ऑक्सीजन को नहीं कह सकते, क्योंकि वातावरण में ऑक्सीजन की सान्द्रता पर्याप्त मात्रा में होती है।
(iv) महत्वपूर्ण सीमाकारी कारक —
(IMPORTANT LIMITING FACTORS)
वातावरण में मिलने वाले अनेक भौतिक व रासायनिक कारक परिस्थितियों के अनुसार सीमाकारी कारकों की तरह व्यवहार करते हैं। जैसे- वायुमण्डलीय गैसें (O, N, H, CO) दीर्घ पोषक तत्व (Mg, Ca, P, K, S), सूक्ष्म पोषक तत्व (Mn, Mo, Na, Cl, Cu, Zn, B, Fe) प्रकाश, ताप, जल, भूमि आदि।
ओडम (Odum, 1972) के अनुसार सहनशीलता की सीमा एवं परिवर्तनशीलता द्वारा प्रकृति में प्राणी
नियमित रहते हैं। महत्वपूर्ण सीमाकारी कारक निम्न होते हैं
(i) जल (Water ) – यह समस्त प्राणियों एवं जीवों के लिए अति आवश्यक पदार्थ है। बिना जल के जीवन संभव नहीं है। यह प्रोटोप्लाज्म का प्रमुख घटक है। इसकी कमी या अधिकता ऑस्मोरेगुलेशन को प्रभावित करती है।
(ii) प्रकाश (Light) – पारिस्थितिक तंत्र में सूर्य, प्रकाश एवं ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। सूर्य के प्रकाश के बिना जीवन संभव नहीं है। पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सूर्य प्रकाश के बिना संभव नहीं है।
(iii) तापक्रम (Temperature) – यह प्राणियों के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है। सभी जीव-जन्तु अनुकूल तापमान पर अच्छी तरह से विकसित होते हैं।
(iv) वायुमण्डलीय गैसें (Atmospheric gases) – वायुमण्डल में पायी जाने वाली गैसें जीव-जन्तुओं के लिए महत्वपूर्ण होती है। जैसे नाइट्रोजन 78% होती है पौधे इसे नाइट्रेट्स के रूप में ग्रहण करते हैं। जलीय समुदायों में नाइट्रोजन सीमाकारी कारक की तरह कार्य करते हैं। उसी प्रकार ऑक्सीजन मात्र 21% वायुमण्डल में पायी जाती है। जलीय वातावरण में यह सीमाकारी होती है। उसी तरह कार्बन डाइऑक्साइड 0-04% होती है। यह उच्च श्रेणी पौधों के लिए सीमाकारी होती है।
(v) सूक्ष्म एवं दीर्घ पोषक तत्व (Micro and Macro nutrients) – सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे—जिंक, कोबाल्ट, लोहा, मँगनीज आदि पौधों एवं जन्तुओं के लिए आवश्यक होते हैं उसी प्रकार दीर्घ पोषक तत्व जैसे— कैल्सियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस आदि के यौगिक सभी प्राणियों के लिए आवश्यक होते हैं।