विषाक्तता (Toxicity) को समझाइये। विषाक्तता को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।

विषाक्तता (Toxicity) को समझाइये। विषाक्तता को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।

अथवा

टिप्पणी लिखिए – क्रमिक जहर विज्ञान (Systemic toxicology)


उत्तर—

विषाक्तता ( Toxicity ) —

किसी जैविक तंत्र को क्षति पहुँचाने की क्षमता को किसी पदार्थ की टॉक्सिसिटी क्षमता कहते हैं। इसमें विभिन्न रासायनिक पदार्थों की टॉक्सिसिटी की आयाम में तुलना की जाती है। अत्यधिक टॉक्सिक पदार्थ की कम मात्रा भी किसी जीव के लिए घातक होती है, किन्तु कम टॉक्सिक पदार्थ की अधिक मात्रा होने पर भी जीव प्रभावित नहीं होता है। टॉक्सिसिटी का प्रभाव टॉक्सिसिटी पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है। टॉक्सिक पदार्थ दो प्रकार के होते हैं-। (i) प्राकृतिक टॉक्सिक पदार्थ (Natural toxic substance), (ii) संश्लेपित टॉक्सिक पदार्थ (Synthetic toxic substance)।

(i) प्राकृतिक टॉक्सिक पदार्थ (Natural toxic substance)—ये पौधों या खनिजों से प्राप्त होते हैं। जन्तुओं द्वारा प्राप्त टॉक्सिन (Toxin) भी इसी श्रेणी में आते हैं। अनेक पौधों से प्राप्त टॉक्सिक पदार्थों (Toxic substances) जिससे औषधियाँ बनाई जाती हैं। इनमें से कुछ अफीम, ऐट्रोपिन, रेसरपिन, क्वीनिन, पिक्रोटॉक्सिन (Atropine, Reserpine, Quinine, Picrotoxin) आदि हैं। अनेक ऐण्टिबॉयोटिक्स (Antibiotics) सूक्ष्म जीवों से प्राप्त होते हैं।

विप (Poison) एक ठोस द्रव या गैसीय पदार्थ होता है। जिसे यदि किसी भी मनुष्य या प्राणी के शरीर में निवेशित किया जाता है या फिर शरीर के किसी भाग के सम्पर्क में होता है तो मनुष्य या प्राणी का शरीर अस्वस्थ्य हो जाता है या मृत्यु हो जाती है।

ऐसे विष जो पादपों (Plants) से व्युत्पन्न स्त्रावित पदार्थ प्राणियों से जैसे सर्प, कीट के द्वारा काटना, बिच्छू (Scorpion) आदि से प्राप्त होते हैं। जहरीले जानवर पूरे पशु साम्राज्य में व्यापक रूप से वितरित किये गये है। यह विष ग्रंथि द्वारा निर्मित होते हैं।

(ii) संश्लेषित टॉक्सिक पदार्थ (Synthetic toxic substance) — अनेक टॉक्सिक पदार्थ संश्लेषित प्रकार के होते हैं, जिनको कृत्रिम रूप से बनाया जाता है। इनका निर्माण प्राकृतिक पदार्थों की संरचना में फेर बदल करके भी किया जा सकता है।

रासायनिक पदार्थों की टॉक्सिसिटी (Toxicity) दो प्रकार से जीव को प्रभावित करती है

1. स्थानीय (Local)—इसमें टॉक्सिक पदार्थ (Toxic substance) किसी ऊतक के सम्पर्क में आने पर उसे उत्तेजित कर देता है। यह क्रिया काफी तीव्र होती है तथा ऊतक नष्ट हो जाता है। कास्टिक सोडा व अन्य क्षार तथा खनिज एसिड (Acid) इस प्रकार के स्थानीय रूप से हानि पहुँचाने वाले टॉक्सिक पदार्थ हैं। कुछ रसायन ऐसे भी हैं, जिनका ऊतक पर प्रभाव क्षणिक व कम तीव्रता वाला होता है। दुर्बल क्षार व अम्ल कम तीव्रता वाले होते हैं। दुर्बल क्षार व अम्ल मुख्यतः स्थानीय रूप से प्रक्रिया करते हैं।

2. क्रमिक जहर विज्ञान (Systemic toxicology) “टॉक्सिकोलॉजी” (Toxicology) – शब्द दो ग्रीक (Greek) शब्दों से मिलकर बना है-टॉक्सिकॉन (Toxikon) = ऐरो Arrow = विष (Poison) तथा लोगोस ( Logos) = अध्ययन (Stydy) । एक सामान्य व्यक्ति के लिए विषविज्ञान (Toxicology) का आशय- रासायनिक पदार्थों का विभिन्न प्रकार के जैविकी तन्त्रों एवं मनुष्य (Biological systems and man) पर हानिकारक प्रभाव के अध्ययन से होता है। वैज्ञानिक रूप से (Scientifically) विपविज्ञान (Toxicology) को रासायनिक पदार्थों एवं मानवोद्भवी (Anthropogenic) पदार्थों या परिजैविक (Xenobiotics) पदार्थों के हानिकारक या विषैले प्रभाव के गुणात्मक (Qualitative) एवं मात्रात्मक (Quantitative). अध्ययन को कहते है। विषैले प्रभाव को विभिन्न प्रकार के घातक प्रभाव वृद्धि (Growth), परिवर्धन (Development), प्रजनन (Reproduction), शरीर क्रिया/रोग विज्ञान (Pathology), जैवरासायनिकी (Biochemistry), कार्यकीय (Physiology), व्यवहार (Behaviour), औषध-गतिज प्रतिक्रिया (Pharmacokinetic responses), में परिवर्तन द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।

विषविज्ञान रासायनिक पदार्थों की सान्द्रता या मात्रा जो वातावरण में पाई जा सकती है उससे भी सम्बन्धित होता है, इस कारण इसके अध्ययन के अन्तर्गत वातावरण में रासायनिक पदार्थों के परिवहन (Transport), वितरण (Distribution), रूपान्तरण (Transformation) एवं इनका भविष्य (Fate) आता है। आधुनिक विषविज्ञान (Modern toxicology) को परिनिष्ठित विषविज्ञान (Classical toxicology) से भिन्नित करने के हेतु शब्द इकोटॉक्सिकोलाजी / पारिविषविज्ञान (Ecotoxicology) को वर्ष 1974 में टाउहाउट (Trauhaut) ने वर्णन किया था। पारिविषविज्ञान (Ecotoxicology), पारिस्थितिकी तन्त्र (Ecosystem) पर वातवरणीय प्रदूषकों (Pollutants) के प्राकृतिक दशाओं में हानिकारक प्रभाव का अवबोध है।

टॉक्सिसिटी को प्रभावित करने वाले कारक—

निम्नलिखित कारक टॉक्सिसिटी को प्रभावित करते हैं

1. एक्सपोजर (Exposure ) —— जीव को प्रभावित करने के लिए रसायन का तीव्र या दीर्घकालीन एक्सपोजर होना आवश्यक होता है

(i) तीव्र एक्सपोजर (Acute exposure ) — यह कम अवधि का एक्सपोजर (Exposure) है, जिसमें कोई जीव एक ही बार अथवा कुछ ही समय के अन्दर (एक दिन में) अनेक बार प्रभावित होता है। तेजी से अवशोषित होने वाले रसायनों के तीव्र एक्सपोजर (Acute exposure) का प्रभाव दीर्घगामी एक्सपोजर (Chromic exposure) की भाँति कुछ विलम्ब से होता है। सामान्य रूप से जीव के जीवन चक्र की तुलना तीव्र एक्सपोजर की अवधि बहुत कम होती है। में

(ii) दीर्घगामी एक्सपोजर (Chromic exposure)—इसमें जीव रासायनिक पदार्थ की निम्न सान्द्रता द्वारा अनेक सप्ताह, माह या वर्षों तक अनावरित (Exposed) होते रहते हैं। दीर्घगामी एक्सपोजर (Chrome exposure) का जीवों पर तेजी से प्रभाव पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त उनमें मंद गति से होने वाले प्रभाव भी विकसित होते रहते हैं। सामान्य रूप से दीर्घगामी एक्सपोजर द्वारा जीव अपने जीवन चक्र के अधिकांश भाग में प्रभावित होता है।

(iii) उप- तीव्र व उप- दीर्घगामी एक्सपोजर (Sub-acute and Sub-chromic exposure)- इनकी • अवधि उपर्युक्त एक्सपोजरों (Exposures) की तुलना में कम अर्थात् एक माह से लेकर कुछ माह तक की होती

है। (मुख्यतः 14 दिन से 60 दिन तक ) ।

2. जैविक कारक (Biological factors) — ये निम्नलिखित हो सकते हैं—

(i) आयु (Age) – किसी रसायन का टॉक्सिसिटी (Toxicity) को प्रभावित करने वाला यह एक प्रमुख कारक है। नये जन्मे शिशुओं एवं वृद्ध व्यक्तियों के लिए तो यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। शरीर में प्रवेश करने पर जीव द्वारा इसकी विषाक्तता खत्म करने या उत्सर्जन न होने की अवस्था में विषाक्त पदार्थों का टॉक्सिक (Toxic) प्रभाव अधिक तीव्र हो जाता है। युवा अवस्था में यह कार्य सुगमतापूर्वक नहीं होता, जबकि वृद्धावस्था में शरीर के विभिन्न तन्त्र सुचारु रूप से इस कार्य को करने में असमर्थ होते हैं।

(ii) जीवन शक्ति (Vitality ) — यह शरीर के स्वास्थ्य की स्थिति है, जिसकी टॉक्सिक रसायन (Toxic chemical) के प्रभाव पर प्रमुख भूमिका होती है। दुर्बल व रोगी व्यक्तियों के शरीर में टॉक्सिक (Toxic) पदार्थ की थोड़ी मात्रा भी टॉक्सिसिटी (Toxicity) उत्पन्न कर देती है, जबकि स्वस्थ व शक्तिशाली व्यक्तियों पर इस मात्रा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

(iii) भार (Weight)— रासायनिक पदार्थ की टॉक्सिसिटी (Toxicity) की मात्रा जीव के प्रति यूनिट भार प्रति टॉक्सिक रसायन की मात्रा पर निर्भर करती है। अधिक भार वाले जीव पर टॉक्सिक पदार्थ की एक निश्चित मात्रा कम भार वाले जीव की तुलना में कम प्रभावी होती है। (iv) आमाशय में भोजन की उपस्थिति (Presence of food in stomach) आमाशय खाली होने

पर टॉक्सिक पदार्थ का असर तेजी से होता है, जबकि आमाशय में भोजन रहने पर उसका असर धीमी गति से होता है। (v) पैथोलॉजिकल अवस्थाएँ (Pathological conditions) शरीर की पैथोलॉजिकल अवस्था ऊतकों की टॉक्सिक पदार्थ के प्रति अनुक्रिया को इस प्रकार प्रभावित करती है कि या तो इसका प्रभाव टॉक्सिक हो जाता है अथवा विभिन्न रसायनों के प्रति इसके प्रतिरोध में वृद्धि हो जाती है।

(vi) इम्यूनोलॉजिकल कारक (Immunological factors)— जीव द्वारा किसी रासायनिक पदार्थ द्वारा प्रथम बार एक्सपोज होने पर उसका प्रतिरक्षात्मक तंत्र उत्तेजित हो जाता है, जिसके फलस्वरूप शरीर में ऐण्टिबॉडीज बन जाती है। उसी या उसी के समान रसायन से और अधिक प्रभावित होने पर उसके प्रति तीव्र अनुक्रिया होती है।

3. वातावरणीय कारक — वातावरण के तीन कारकों का जन्तुओं पर टॉक्सिसिटी के परीक्षण के समय ध्यान रखते हैं। ये कारक हैं— (i) मनुष्य एवं अन्य जन्तुओं की उपस्थिति, (ii) उसी जाति के अन्य जन्तुओं की उपस्थिति एवं (iii) प्रकाश, ताप एवं आर्द्रता आदि भौतिक कारक ।

4. रसायनों से संबंधित कारक रसायन के भौतिक एवं रासायनिक गुण, रसायन के शरीर में प्रवेश करने की विधि तथा विभिन्न रसायनों की आपस में प्रतिक्रिया शामिल है। सामान्य रूप से रसायन की टॉक्सिसिटी (Toxicity) उस मार्ग द्वारा अत्यधिक उग्र होती हैं, जिसके द्वारा यह तेजी से रुधिर प्रवाह में प्रवेश करता है। मुख द्वारा लेने पर रसायन की उग्रता तभी तीव्र होती है, जब यह आहारनाल में पहुँचकर एक सक्रिय यौगिक बनाता है। रसायन की टॉक्सिसिटी (Toxicity) उसके संघटन पर निर्भर करती है। यह ऐसे रसायनों से बना हो सकता है, जो शुद्ध रसायन की तुलना में अधिक टॉक्सिक (Toxic) होते हैं। रसायनों की सही पहचान एवं इनकी शुद्धता इनकी टॉक्सिसिटी (Toxicity) को टेस्ट (Test) करते समय महत्वपूर्ण होते हैं। रसायन से संबंधित अन्य कारक जो इसकी टॉक्सिसिटी (Toxicity) को प्रभावित करते हैं, जैसे- भौतिक व रासायनिक गुण, वाष्प दाव तथा pH आदि ।

Published by Naveen

learning

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started