व्यावहारिक सूक्ष्मजैविकी पर एक लेख लिखिए तथा व्यावहारिक सूक्ष्मजैविकी का महत्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा
सूक्ष्मजैविकी से आप क्या समझते हैं ? सूक्ष्मजैविकी के अनुप्रयोगों का वर्णन कीजिए।
अथवा
टिप्पणी लिखिए- कृषि सूक्ष्मजीव विज्ञान ।
उत्तर-
मनुष्य के जीवन में आदिकाल से ही सूक्ष्मजीवों का प्रभाव रहा है और वह हमारे जीवन का एक भाग है। सभी प्रकार के जीव विज्ञानों में सूक्ष्मजैविकी (Microbiology) अत्यधिक व्यावहारिक है। सूक्ष्मजैविकी का आशय छोटी सजीव वस्तुओं की जैविकी (Biology) से होता है। “सूक्ष्मजैविकी जीव विज्ञान (Biology) की एक शाखा है जिसमें सूक्ष्मदर्शीय जीवों (Microscopic organism) का अध्ययन किया जाता है ।” सूक्ष्मजैविकी के अंतर्गत जीवाणु (Bacteria), कवक (Fungi), शैवाल (Algae) एवं प्रोटोजोआ (Protozoa) तथा संक्रमणकारी विषाणु (Viruses) आते हैं।
सूक्ष्मजीव, एककोशिकीय होते हैं। इस एककोशिकीय जीव की एकल कोशिका के द्वारा जीवन की सम्पूर्ण विधियों को पूर्ण किया जाता है।
सूक्ष्मजीव विज्ञान की कई शाखाएँ होती हैं-
1. जीवाणु विज्ञान (Bacteriology) — इसमें जीवाणुओं का अध्ययन किया जाता है।
2. विषाणु विज्ञान (Virology)— इसमें विषाणु (Viruses) एवं रिकेट्सिया (Rickettsia) आदि आते हैं।
3. प्रोटोजूलॉजी (Protozoology)—— इसमें प्रोटोजोआ के प्राणियों का अध्ययन किया जाता है।
4. फायकोलॉजी (Phycology )—इसमें शैवाल (Algae) का अध्ययन किया जाता है।
5. माइकोलॉजी (Mycology)—इसके अंतर्गत यीस्ट (Yeast), मोल्ड (Moulds), जैसे कवकों (Fungi) का अध्ययन किया जाता है।
सूक्ष्मजैविकी के प्रमुख क्षेत्र या सूक्ष्मजैविकी के अनुप्रयोग (Main fileds of microbiology of uses of microbiology)—
सूक्ष्मजैविकी के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक क्षेत्र होते हैं। सैद्धांतिक क्षेत्र में वैज्ञानिकों के द्वारा नई सूचनाओं को एकत्रित किया जाता है तथा उसके आधारभूत सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाता है और इसके उपयोग के लिये व्यावहारिक सूक्ष्म वैज्ञानिकों को निर्देश एवं सलाह दिए जाते हैं। यहाँ पर सूक्ष्मजैविकी के कुछ प्रमुख व्यावहारिक क्षेत्रों का वर्णन किया जा रहा है-
1. चिकित्सीय सूक्ष्मजैविकी (Medical microbiology)—यह मनुष्यों के लिए सबसे ज्यादा परिचित एवं जाना-पहचाना क्षेत्र है। इसमें मनुष्य, प्राणियों एवं पौधों में रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों के संबंध में अध्ययन किया जाता है। बहुत से रोग जैसे-इन्फ्लूएंजा (Influenza), टिटेनस (Tetanus), , मलेरिया (Malaria) आदि फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों के संक्रमण का अध्ययन किया जाता है।
2. जल एवं व्यर्थ जल की सूक्ष्मजैविकी (Water and Waste water microbiology) —जल में कई प्रकार के सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं, जिसमें से कुछ विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। पानी के विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल में जो हानिकारक विषाणु, जीवाणु एवं अन्य सूक्ष्मजीव पाये जाते हैं उनको समाप्त करने के पश्चात् ही रोगों की रोकथाम की जा सकती है। बहुत से बीमारियों का फैलाव जल के द्वारा होता है। अतः जल को उपयोग के पूर्व साफ करना आवश्यक होता है। वाहितमल जल को भी वातावरण में छोड़ने के पूर्व उपचारित किया जाता है।
3. आहार सूक्ष्मजैविकी (Food microbiology)— भोज्य पदार्थों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए लंबी अवधि हेतु भण्डारण किया जाता है, जिससे सूक्ष्मजीवों के द्वारा यह भोजन संदूषित हो सकता है। अतः सूक्ष्जीवों की आहार विषाक्तता, संरक्षण एवं अपक्षयन में भूमिका अध्ययन इस क्षेत्र में किया जाता है। सूक्ष्मजीवों के द्वारा भोजन को अपक्षय एवं खाने के अयोग्य बना दिया जाता है, अतः इससे बचने के लिए भोजन का भंडारण एवं संरक्षण किया जाता है। इस विधि में प्रमुख विधि पाश्चुरीकरण (Pasteurization) की विधि है।
4. मृदा एवं कृषि सूक्ष्मजैविकी (Soil and Agricultural microbiology)- उर्वरक मृदा में सूक्ष्मजीवीय पादप जैसे – जीवाणु, शैवाल एवं कवक पाए जाते हैं। यह मृत होने वाले पादपों एवं जीवों के शरीर के जि कार्बनिक पदार्थों का अपक्षय करके, उन्हें पुनः चक्रण के योग्य बनाते हैं। इस क्रिया से भूमि की उर्वरता बढ़ती है तथा पैदावार ज्यादा प्राप्त होती है।
5. औद्योगिक सूक्ष्मजैविकी (Industrial microbiology) — यह व्यावहारिक सूक्ष्मजैविकी का एक प्रमुख एवं उन्नत क्षेत्र है। इन सूक्ष्मजीवों की सहायता से मनुष्य के उपयोग की उत्पादों का उत्पादन की क्षमता को बढ़ा सकते हैं। इस विज्ञान के द्वारा विशिष्ट प्रकार के सूक्ष्मजीवों, यीस्ट, जीवाणुओं की अधिक मात्रा में वृद्धि की जाती है और इन सबकी वृद्धि के लिए बड़े-बड़े पात्रों का उपयोग किया जाता है। इन सूक्ष्मजीवों का उपयोग एन्जाइम (Enzymes), अमीनो अम्ल (Amino acids), प्रतिजैविक (Antibiotics), ऐल्कोहॉल (Alcohol), कार्बनिक अम्लों (Organic acids), वैक्सीन (Vacines), स्टीरॉयड्स (Steroids), संश्लेषित ईंधन (Syn thetic fuels) तथा औषधी निर्माण संबंधी (Pharmaceuticals) क्षेत्रों में किया जाता है।
प्रोटियोलिटिक सूक्ष्मजीव विज्ञान (Proteolytic Micro-organism)—
प्रोटियोलिटिक बैक्टीरिया बाह्य प्रोटीन के उत्पादन के कारण प्रोटीन को हाइड्रोलाइज करने में सक्षम है। जेनेरा अल्कालिजेन्स, बैसिलस, माइक्रोकॉक्स, स्टैफिलोफोकस, स्यूडोमोनास, क्लोस्ट्रीडियम और कुछ ऐटरोबैक्टीरिया प्रोटियोलिटिक है।
प्रोटियोलिटिक बैक्टीरिया एल्ब्यूमेन को पचाते हैं। जर्दी को काला करते हैं एवं लाइसिन डिकार्बोक्साइलेशन के कारण एक अप्रिय गंध उत्पन्न करते हैं।
बैक्टीरिया में प्रोटियोलिटिक सूक्ष्मजीव है। जो प्रोटीन को तोड़ते हैं। विशेष रूप से दूध एवं डेयरी उत्पादों में अवांछित गंध और स्वाद होता है। प्रोटियोलिटिक बैक्टीरिया की गणना प्रयोगशालाओं में मानक स्मीयर कल्चर काउंटिंग विधि द्वारा निर्धारित की जाती है। जिसमें एक विशेष मीडिया का उपयोग किया जाता है। जिसके लिए कैल्सियम कैसिनेटएगर का उपयोग किया जाता है।
6. सूक्ष्मजैविकी एवं जैव-प्रौद्योगिकी (Microbiology and Biotechnology) — “तकनीकी और औद्योगिक प्रक्रियाओं में जैविक सूक्ष्मजीवों और अणुओं का उपयोग जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnology) कहलाता है।” जैव-प्रौद्योगिकी का क्षेत्र अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस प्रौद्योगिकी का उपयोग किण्वन (Fermentation) के द्वारा नई औषधियाँ प्राप्त करने में अनेक प्रकार के हॉर्मोन्स (Hormones), एन्टीबायोटिक्स
एवं एन्जाइम्स (Enzymes) के उत्पादन में किया जा रहा है। फसलों की उत्पादन क्षमता, प्रोटीन की मात्रा, कार्बोहाइड्रेट की मात्रा, प्रतिरोधक क्षमता आदि की वृद्धि करने के लिए भी जैव प्रौद्योगिकी में प्रयोग किये जा रहे हैं। जैव-प्रौद्योगिकी का उपयोग मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रों/कार्यों में किया जाता है-
(A) किण्वन तकनीक (Fermentation technique)— इस तकनीक का उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में किया जाता है-
(i) स्वास्थ्य (Health)—एण्टिबायोटिक, एन्जाइम्स, विटामिन्स, अमीनो अम्ल, न्यूक्लिओटाइड, स्टीरॉइड्स, ऐल्केलायड्स एवं पॉलीसेकेराइड्स के निर्माण के क्षेत्र में।
(ii) कृषि (Agriculture) आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic engineering) के उपयोग से पौधों को कीटों (Insects), विषाणुओं, कवक (fungus) एवं खरपतवार के संक्रमण के विरुद्ध प्रतिरोधी बनाया जाता है। पौधों, फलों में प्रोटीन, अमीनो अम्लों एवं वसाओं की वृद्धि की जाती है। पौधों में N½ स्थिरीकरण क्षमता बढ़ाई जाती है।
(iii) खाद्य व कृषि उद्योग (Food and Agricultural industries )— लैक्टिक अम्ल, अमीनो अम्ल मैलिक अम्ल, साइट्रिक अम्ल, न्यूक्लियोटाइड्स एवं बायोपॉलिमर्स निर्माण में ।
(iv) रासायनिक उद्योग (Chemical industry)—एथीलिन (Ethylene), ऐसीटोन Acetone), ब्यूटेनॉल (Butanol) एवं ऐसीटैल्डिहाइड (Acetaldehyde) के अधिक उत्पादन के लिए।
(v) ऊर्जा (Energy)—बायोगैस (Biogas), ऐसीटोन (Acetone), एथेनॉल (Ethanol), जैसे ऊर्जा के लिए स्रोत के उत्पादन बढ़ाने में।
(B) जीन अभियांत्रिकी एवं कोशिका संवर्धन (Genetic engineering and Cell culture ) — इस तकनीक का उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में किया जाता है- –
(i) स्वास्थ्य (Health)—— हॉर्मोन्स (Hormones), इन्टरफेरॉन (Interferon), मोनोक्लोनल एण्टीबॉडीज Monoclonal antibodies) एवं वैक्सीन (Vaccine) उत्पादन में
(ii) खाद्य एवं कृषि उद्योग (Food and Agriculture Industry )— एकल कोशिका प्रोटीन उत्पादन में।
(C) एन्जाइमी अभियांत्रिकी (Enzymatic engineering)-
(i) ऊर्जा (Energy)—एथेनॉल उत्पादन में ।
(ii) खाद्य एवं कृषि उद्योग-ग्लूकोज (Glucose) एवं आइसोग्लूकोज उत्पादन में ।