विषाणु क्या है ? विषाणु की संरचना पर एक लेख लिखिए।

विषाणु क्या है ? विषाणु की संरचना पर एक लेख लिखिए।

अथवा

विषाणु की संरचना एवं प्रजनन का वर्णन कीजिए।


उत्तर-

विषाणु (Viruses)-

विषाणु या वायरस शब्द का उद्गम लैटिन भाषा से हुआ है, जिसका अर्थ ‘घातक विष’ (Morbid poison) होता है। मनुष्यों में अनेक भयंकर बीमारियाँ, जैसे – इन्फ्लूएन्जा, पोलियो, चेचक (Small pox) वायरस के कारण ही होती है। वायरस अति सूक्ष्मजीवियों का एक समूह है, जो परजीवी होते हैं। वायरस को न तो पादपों में और न ही जन्तुओं की श्रेणी में रखा जा सकता है।

पाश्चर (Pasteur, 1867) ने सर्वप्रथम कीटों में वायरस रोगों का अध्ययन किया, जिसे फ्लैकरी (Flacherie) कहा गया। इवानोस्की ( Ivanovsky) ने 1892 में इस वायरस के प्रकृति का अध्ययन किया। बाद में अनेक वैज्ञानिकों ने विभिन्न जन्तुओं में पाए जाने वाले वायरस के सम्बन्ध में बताया।

महत्वपूर्ण लक्षण (Important characteristic features)—

विषाणुओं के महत्वपूर्ण भौतिक एवं रासायनिक गुण निम्नलिखित हैं-

  • 1. विषाणु केवल सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही देखे जा सकते हैं और ये बैक्टीरिया से आकार में छोटे होते हैं।
  • 2. ये बैक्टीरियल फिल्टर्स से छनकर निकल जाते हैं।
  • 3. ये अनिवार्य परजीवी हैं, जो कि सिर्फ जीवित कोशिकाओं में ही वृद्धि और गुणन कर सकते हैं।
  • 4. ये कृत्रिम संवर्धन पर नहीं उगाए जा सकते हैं।
  • 5. ये विशिष्ट प्रकार के पोषकों तथा ऊतकों पर ही आक्रमण करते हैं।
  • 6. ये ताप तथा रासायनिक पदार्थ द्वारा निष्क्रिय किए जा सकते हैं।
  • 7. ये परपोषी (Host) के प्रति विशिष्टता प्रदर्शित करते हैं।
  • 8. ये न्यूक्लियो प्रोटीन के बने क्रिस्टल होते हैं। 9. इनमें आनुवंशिक पदार्थ DNA या RNA होते हैं।

विषाणु की प्रकृति (Nature of viruses) वायरस की प्रकृति के बारे में अनेक वैज्ञानिकों ने अनेक प्रकार के मत प्रस्तुत किए हैं। कुछ ने वायरस को सजीव तो कुछ ने इसे निर्जीव माना है। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित मत प्रस्तुत किए गये हैं-

(A) वायरस के निर्जीव लक्षण (Non-living properties of viruses)—

  • (1) इन्हें आसानी से रवों (Crystals) में प्राप्त किया जा सकता है।
  • (2) पोषक के शरीर के बाहर ये निष्क्रिय रासायनिक पदार्थों के समान होते हैं।
  • (3) इसमें श्वसन, प्रकाश-संश्लेषण आदि जैसी क्रियायें नहीं पाई जाती हैं।
  • (4) इसमें कोशिका-भित्ति कोशिका कला तथा जीवद्रव्य का अभाव होता है।
  • (5) इनमें एन्जाइमी तंत्र नहीं पाया जाता है।

(B) वायरस के सजीव लक्षण (Living properties of viruses)—

  • (1) वायरस में वृद्धि तथा जनन की क्रियाएँ जीवित कोशिका के अन्दर ही होती हैं।
  • (2) इनमें ताप, रसायन आदि के प्रति उद्दीपन होता है।
  • (3) ये जीवित पादप, जन्तुओं तथा जीवाणु में रोग उत्पन्न करते हैं।
  • (4) इनका आनुवांशिक पदार्थ पुनरावृत्ति (Replication) करता है।
  • (5) इनमें RNA या DNA तथा प्रोटीन्स पायी जाती हैं।
  • (6) पोषक के प्रति विशिष्ट होते हैं।
  • (7) ये एक परपोषी से दूसरे परपोषी में संचारित हो जाते हैं।
  • (8) इनमें गुणन (Multiplication) तथा उत्परिवर्तन (Mutation) होते हैं।
  • (9) प्रत्येक वायरस में न्यूक्लिक अम्ल होता है, जो प्रोटीन के आवरण द्वारा घिरा रहता है।

आकृति एवं माप (Shape and Size) ये विभिन्न आकृति तथा साइज वाले होते हैं। ये गोलाकार (Spherical), छड़ के आकार (Rod-shaped) से लेकर बहुतलीय (Polyhedral), कुण्डलित (Coiled) अथवा सर्पिल (Spiral) आकार के होते हैं। वाइरस 17 व्यास से लेकर 500×12 तक के हो सकते हैं।

संरचना (Structure)—

वायरस न्यूक्लिक अम्ल तथा प्रोटीन्स के बने हुए होते हैं। प्रोटीन न्यूक्लिक अम्ल के चारों ओर एक आवरण बनाता है, जो कैप्सिड कहलाता है। विषाणु के मध्य में न्यूक्लिक अम्ल का केन्द्रीय कोर होता है। न्यूक्लिक अम्ल में RNA या DNA पाये जाते हैं। केन्द्रीय कोर तथा कैप्सिड को संयुक्त रूप से न्यूक्लियोकैप्सिड कहते हैं।

तम्बाकू मोजैक वाइरस (TMV) की संरचना बेलनाकार होती है, जिसका व्यास 160Å तथा लम्बाई 3000 होती है। प्रोटीन आवरण अनेक (2130) उप इकाइयों में विभक्त रहता है, जिन्हें कैप्सोमीयर (Capsomere) कहते हैं। इनका RNA 2130 कैप्सोमीयर्स को कुण्डलित रूप में जोड़ता है। शुष्क भा के अनुसार प्रोटीन 94-5% तथा न्यूक्लिक अम्ल 5.5% होता है। कुछ जन्तु विषाणुओं एवं जीवाणुभोजी (Bacteriophage) में DNA पाया जाता है। विषाणु का न्यूक्लिक अम्ल RNA या DNA ही संक्रामक होता है। यही विषाणु के लिए प्रोटीन संश्लेषण को नियंत्रित करता है और अपने लिए पुनरुत्पादित होते हैं।

विषाणु में कार्बोहाइड्रेट और लाइपोइड्स का पूर्ण अभाव रहता है। इनमें कोई भी एन्जाइम तंत्र नहीं पाया जाता है। अतः ये पोषक के ही एन्जाइम तंत्र को नियंत्रित कर उसकी ऊर्जा से अपना गुणन करते हैं।

विषाणु जनन (Virus reproduction)—

विषाणु केवल पोषक की जीवित कोशिकाओं में ही पुनरुत्पादित हो सकते हैं। पोषक के बाहर ये निष्क्रिय होते हैं। पोषक कोशिका के भीतर प्रवेश कर ये अपना प्रोटीन आवरण छोड़ देते हैं और न्यूक्लिक अम्ल कोशिका के भीतर स्वतंत्र हो जाता है। पोषक कोशिका के भीतर विषाणु के न्यूक्लिक अम्ल RNA या DNA पोषक कोशिका की जैव-रासायनिक (Biochemical) क्रियाओं पर नियंत्रण कर लेते हैं। पोषक कोशिका इस तरह विषाणु के समान न्यूक्लिक अम्ल बनाना शुरू कर देती है और इस प्रकार विषाणु का गुणन अलैंगिक विधि से हो जाता है। यह गुणन की क्रिया दो चरणों में पूरी होती है-

(i) प्रारंभिक चरण (Early period) — इस चरण में वायरस जीनोम गुणन हेतु सक्रिय होता है। इनमें पोपी के DNA, RNA तथा प्रोटीन संश्लेषण का नियंत्रण करके प्रोटीन संश्लेषण वायरस के अनुसार होता है, फिर वायरस के DNA एवं RNA की तरह का संश्लेषण होता है।

(ii) पश्चात् चरण (Late period)— इस चरण में वायरस की क्रिया उभर जाती है और वायरस जीनोम एवं प्रोटीन के मिलने से नए वायरस का निर्माण होता है। यह क्रिया माफजिनेसिस (Morphogenesis) कहलाती है। इस प्रकार से नए वायरस का निर्माण पूर्ण होता है।

Published by Naveen

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