विषाणुओं द्वारा मनुष्य में होने वाली बीमारियों के बारे में एक लेख लिखिए।
अथवा
विषाणुजनित रोग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
वायरस (Virus) –
वायरस (Virus) की रचना में न्यूक्लिक अम्ल प्रोटीन की परत से घिरी रहती है। वाइरस के विभिन्न प्रणालियों के द्वारा मनुष्य के शरीर में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं, जिन्हें आगे तालिका में प्रदर्शित किया गया हैं-
इनमें से महत्वपूर्ण बीमारियों के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन दिया जा रहा है-
(1) एड्स (AIDS) –
एड्स का पूरा नाम ‘Aquired Immune Deficiency Syndrome’ है। इस रोग से सन् 1980 में सर्वप्रथम न्यूयार्क में एक मनुष्य की मृत्यु हुई थी। उस मनुष्य की मृत्यु इम्यूनोसप्रेशन के कारण हुई थी। अतः उसी के आधार पर इस बीमारी का नाम ‘एड्स’ रखा गया। यह बीमारी अफ्रीका में बहुत ही सामान्य है और लगभग 2.5 मिलियन लोग AIDS वाइरस से प्रभावित हैं। इसकी शुरुआत यूरोप में हुई थी और इसके लक्षण के सम्बन्ध में 1979 में अध्ययन किया गया।
जब इम्यून तंत्र में T-helper कोशिकाओं की संख्या में अप्रत्याशित कमी आ जाती है तब इम्यून तंत्र अपना कार्य करना बन्द कर देती है। फलस्वरूप मनुष्य में AIDS का संक्रमण हो जाता है। इस बीमारी के लक्षण अचानक परिलक्षित होते हैं। प्रारम्भिक लक्षणों में हल्के बुखार का होना, ग्रंथियों का सूज जाना एवं सामान्य कमजोरी का आ जाना है। एक संक्रमण के बाद दूसरा संक्रमण फिर अन्य संक्रमण मरीज में होता है, जो मृत्यु होते तक होते रहता है।
मनुष्य लिम्फैडेनोपेथी सिन्ड्रोम (Lymphadenopathy Syndrome) से पीड़ित होता है, तब इस LAV कहते हैं। इसे बाद में IDAV (Immune Deficieny Associated Virus) कहा गया। बाद वाइरस में सन् 1986 में इसको HIV (Human Immune Deficiency Syndrome) कहा गया।
HIV की बाह्य संरचना (Morphology of HIV) –
HIV को बाह्य स्तर कोर कवच और RNA को आंतरिक कोर में विभाजित किया गया है। यह 0-1 माइक्रो मीटर व्यास वाली होती है।
(i) बाह्य स्तर (Outer envelope ) — इस स्तर में प्रोटीन होती है जो कि 12 पेन्टागॉन्स और 20 हेक्सागॉन्स से बनी होती है। इसमें अन्य प्रकार के प्रोटीन्स पाये जाते हैं, जिन्हें HLA कहते हैं। यह प्रोटीन मनुष्य
के कोशिका झिल्ली से उत्पन्न होते हैं।
(ii) कोर कवच (Core shell) बाहरी स्तर के ठीक नीचे प्रोटीन का कोर कवच स्थित होता है, जो कि आंतरिक कोर को घेरे रहता है। कोर कवच की आकृति बहुत ही उलझी हुई होती है। यह 60 त्रिकोने तत्व (Triangular elements) से बनी बहुभुजी रचना होती है। यह रचना हेक्सागोनल तथा पेन्टागोनल रचनाओं के एक के बाद एक (Alternate) स्थित होने से बनती है।
(iii) केन्द्रीय या भीतरी कोर (Central or Inner core ) — यह खोखला तथा सँकरे सिरे पर खुला रहता है जबकि दूसरा सिरा फूली हुई गुम्बद के समान होती है। कोर की भीतरी भाग में RNA एवं रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एन्जाइम की स्थिति अभी भी अस्पष्ट है।
अन्य संरचनाएँ (Other structures ) — HIV में न्यूक्लियोप्रोटीन कोर से बनने वाली एक स्ट्रैण्ड वाली RNA जीनोम और प्रोटीन पायी जाती है। गैर-संरचनात्मक प्रोटीन्स एण्टिजन्स की तरह कार्य करते हैं, जो कि अनेक प्रकार के होते हैं। संरचनात्मक प्रोटीन तीन प्रकार के होते हैं। गैग जिन (Gag gene), एन्व जीन (Env gene) एवं पोल जीन (Pol gene)।
जीवन चक्र (Life cycle)— HIV में स्थित RNA से ट्रांसक्रिप्टेज एन्जाइम की उपस्थिति में DNA बनता है। बाद में यह द्विकुण्डलित DNA पोपी कोशिका में एकत्रित हो जाते हैं। यह वाइरस का DNA बाद में कोशिकीय DNA से जुड़ जाता है। कोशिकीय DNA से यह m-RNA (जो कि वायरस प्रोटीन के लिए कोड होता है) और नई वायरस जीनोम की प्रति का निर्माण करता है। अन्त में नई बनी हुई वायरल जीनोम एवं प्रोटीन सम्मिलित रूप से नए वायरस का निर्माण करते हैं, जो कि पुनः नई कोशिका में प्रवेश कर जाती है।
एच. आई. वी. का संक्रमण (Infection of HIV) – HIV का संक्रमण असुरक्षित यौन सम्पर्क, दूषित रक्त के द्वारा एवं इंट्राविनस ड्रग के सेवन से होता है। HIV के शरीर में प्रवेश के कुछ सप्ताह बाद हल्का बुखार, सिर दर्द, लिम्फेडिनोपैथी आदि लक्षण परिलक्षित होते हैं। बीमारी की प्रारम्भिक अवस्था में HIV एटिबॉडीज परीक्षण नकारात्मक आता है, परन्तु बाद में यह सकारात्मक परीक्षण दिखाता है, अतः इसे ‘सिरोकनवर्सन बीमारी’ कहते हैं।
एड्स से बचाव (Preventive measures to AIDS)—–—
(1) समलैंगिक या विषम लैंगिक, असुरक्षित यौन सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए।
(2) शरीर में रक्त या कोई अंग प्रत्यारोपण के समय HIV परीक्षण के बाद ही यह कार्य करना चाहिए।
(3) स्टरलाइज्ड सुई का केवल एक ही बार प्रयोग करके उसे नष्ट करना चाहिए।
(4) नशेड़ी लोगों को एक ही सुई से ड्रग्स नहीं लेना चाहिए।
इलाज (Treatment)—एड्स के इलाज में तत्परता से सही परीक्षण उपरान्त इलाज प्रारम्भ कर देना चाहिए। एड्स का उपचार निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है-
(i) संक्रमण एवं ट्यूमर्स का इलाज एवं सावधानियों से।
(ii) सामान्य व्यवस्थापन को सही रखकर।
(iii) इम्यून तंत्र को मजबूत रखकर ।
(iv) विशिष्ट एन्टी. एच. आई. वी. पदार्थों का उपयोग करके।
त्वरित उपचार से AIDS को बढ़ने से रोका जा सकता है। एक अमेरिकन कम्पनी ने ‘AL-721’ नामक दवाई का निर्माण किया है, जो कि प्राकृतिक लिपिड्स का मिश्रण है और मुर्गी के योक से बनाया जाता है। उपर्युक्त दवाई को संतरे के रस के साथ या ब्रेड में लगाकर मरीज को दिया जाता है। इस दवाई की निश्चित क्रिया-विधि अज्ञात है। आधुनिक खोजों से एक दवाई एजीडोथाइमीडीन (Azidothymidine-AZT) का निर्माण हुआ है, जो कि वायरस के द्विगुणन के लिए आवश्यक उल्टे ट्रांसक्रिप्शन को रोक देता है।
(2) चेचक (Small pox)—
यह Borreliota Variollae नामक वायरस से होता है। इसमें शरीर में छोटे-छोटे फफोले पड़ जाते हैं। गम्भीर रूप से बीमार व्यक्ति की आँख आदि भी खराब हो सकती है। इलाज के लिए सावधानियाँ रखना आवश्यक है तथा बचाव के लिए चेचक का टीका लगवाना चाहिए।
(3) खसरा (Measles) –
यह Briareus varicellae नामक वायरस से होता है। यह चेचक की तरह ही होता है। इसका संक्रमण बच्चों में सबसे अधिक होता है। इससे बचाव के लिए टीका लगवाना चाहिए।
(4) पोलियो (Polio)—
यह कम उम्र के बच्चों में होने वाली वायरल बीमारी है। इसमें हाथ या पैर या दोनों ही अंग का नियंत्रण समाप्त हो जाता है। साथ ही मुँह से लार बहना एवं जबान का लड़खड़ाना भी अन्य लक्षण है। इस बीमारी से बचाव के लिए गर्भावस्था में ही माता को पोलियो का टीका लगवाना चाहिए और बच्चों को पैदा होने के तीन दिनों के अन्दर DPT के टीके लगवाना चाहिए।
(5) रेबीज (Rabies) –
यह कुत्ते के काटने से फैलता है। यह Formido inexorebilis नामक वायरस से होता – है। इस बीमारी में मरीज पानी से डरता है और उसकी गतिविधि कुत्ते के समान हो जाती है। बचाव के लिए समय-समय पर एण्टिरेबीज का टीका लगवा लेना चाहिए।
(6) इनफ्लूएन्जा (Influenza )—–
यह Tarpeia a एवं Tarpeia B नामक वायरस से होता है। इसमें सर्दी हो जाती है, छींक आती है और हल्का-सा बुखार हो जाता है। इसका फैलाव छींक के साथ निकलने वाली जलकणों एवं हवा के साथ एक से दूसरे मनुष्य में होता है।
(7) हीपेटाइटिस (Hepatitis)—
यह मनुष्यों में होने वाली बीमारी है, जो कि दूषित जल पीने से फैलता है। यह कैंसर से भी खतरनाक बीमारी है। इसमें समय रहते उपचार नहीं करने पर मरीज की मृत्यु हो जाती है। इससे बचाव के लिए ‘एण्टि-हीपेटाइटिस’ का इंजेक्शन लगवा लेना चाहिए।